‘It is very difficult to stay away from children, but the work I am doing is also very important, I will give them full time if I win over Corona’ | ‘एक साल से ज्यादा हो गया, बच्चों को ठीक से गले भी नहीं लगा पाई, पर कोरोना को हराने के लिए जो कर रही हूं वह भी बहुत जरूरी है’

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नई दिल्ली3 मिनट पहलेलेखक: पूनम कौशल

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पूरे देश में फ्रंटलाइन वर्कर्स कोरोना से लड़ रहे हैं। कोविड महामारी ने कामकाजी महिलाओं के सामने भी अभूतपूर्व हालात पैदा किए हैं। इस चुनौतीपूर्ण माहौल में वे अपनी ड्यूटी और मां होने की जिम्मेदारी को कैसे निभा रही हैं। मदर्स डे पर आज ऐसी ही तीन मांओं की कहानी, जो अपने बच्चों के प्यार और जरूरतों पर महामारी से लड़ने को तरजीह दे रही हैं।

उर्वशी, नर्स, सरकारी अस्पताल भीलवाड़ा
उर्वशी जब भी काम से लौटतीं हैं, उनके बच्चे उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं, लेकिन वो उन्हें गले नहीं लगा पातीं। ये सब आसान नहीं होता, लेकिन करना पड़ता है। राजस्थान के भीलवाड़ा के सरकारी अस्पताल में एक साल से कोविड वार्ड में काम कर रहीं उर्वशी कुछ दिन पहले कोरोना संक्रमित हुई हैं। उनके पति भी संक्रमित हैं। वो अपने पति के साथ होम आइसोलेशन में हैं।

उर्वशी भर्राई आवाज में कहती हैं, ‘मदर्स डे क्या, मैं तो काफी दिनों से बच्चों को बहुत मिस कर रही हूं। अभी पॉजिटिव हूं तो बच्चों से दूर रहने के दर्द को महसूस कर रही हूं। मैं चाहती हूं कि जो लोग अपने बच्चों के साथ हैं वो जरूर मदर्स डे मनाएं।’

राजस्थान के भीलवाड़ा के एक सरकारी अस्पताल में नर्स उर्वशी कहती हैं कि एक साल से ज्यादा हो गया, बच्चों से दूर-दूर रहना पड़ रहा है। वे कहती हैं, 'लेकिन क्या करें जो काम कर रहे हैं वो भी तो जरूरी है।'

राजस्थान के भीलवाड़ा के एक सरकारी अस्पताल में नर्स उर्वशी कहती हैं कि एक साल से ज्यादा हो गया, बच्चों से दूर-दूर रहना पड़ रहा है। वे कहती हैं, ‘लेकिन क्या करें जो काम कर रहे हैं वो भी तो जरूरी है।’

उर्वशी एक फ्रंटलाइन वर्कर हैं। बीते एक साल से वो लगातार कोविड वार्ड में काम करती रही हैं। उर्वशी की दो बेटियां हैं और वो अपनी मां के काम को समझती हैं। बीते एक साल से उर्वशी अपने बच्चों के साथ बहुत अधिक समय नहीं बिता पाई हैं। वे कहती हैं, ‘मेरे साथ काम करने वाली और देशभर में काम करने वाले बहुत सी मेडिकल स्टाफ इस समय संक्रमित हैं। मैं उन सबसे यही कहूंगी कि अपने बच्चों के लिए जल्द से जल्द ठीक हो जाएं।’

उर्वशी अपने रिकवर होने का इंतजार कर रही हैं। वो जल्द से जल्द अपने वार्ड में लौटना चाहती हैं। वो कहती हैं, ‘मुझे अपनी बेटियों के लिए एक रोल मॉडल बनना है।’ वो कहती हैं, ‘मेरे बच्चों को लगता है कि हमारी मम्मी हैं तो सब सही है। बच्चों को उनके दोस्त बोलते हैं कि तुम्हारी मम्मी कितनी हिम्मत वाली हैं कि कोविड वॉर्ड में काम करती हैं, हम तो कोविड संक्रमितों से दूर भागते हैं, लेकिन तुम्हारी मम्मी तो उन्हें ठीक करती हैं। जब बच्चे ये सुनते हैं तो उन्हें बहुत गर्व होता है।’

जब से कोरोना महामारी शुरू हुई है, उर्वशी को अक्सर ओवरटाइम करना पड़ रहा है। उर्वशी कहती हैं, ‘कई बार महसूस होता है कि मैं अपने बच्चों का ध्यान नहीं रख पा रही हूं। फिर लगता है कि जो काम कर रही हूं वो भी बहुत जरूरी है। कोरोना पर जीत हासिल कर लेंगे, तब उन्हें पूरा समय दूंगी। बहुत कुछ सोचा है जो उनके लिए करना है।’

उर्वशी और उनके पति इस समय कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। उर्वशी कहती हैं कि इस मदर्स डे पर बच्चों से दूर रहना पड़ेगा, लेकिन कोरोना के बीत जाने के बाद बच्चों को पूरा समय देंगे।

उर्वशी और उनके पति इस समय कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। उर्वशी कहती हैं कि इस मदर्स डे पर बच्चों से दूर रहना पड़ेगा, लेकिन कोरोना के बीत जाने के बाद बच्चों को पूरा समय देंगे।

श्रीजना गुम्मला, आईएएस, म्यूनिसिपल कमिश्नर
ग्रेटर वाइजैग म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की कमिश्नर आईएएस अधिकारी श्रीजना गुम्मला की अपने एक महीने के बेटे को गोद में लिए दफ्तर में काम करते हुए तस्वीर वायरल हुई थी। जिस समय उन्हें अपने नवजात बच्चे के साथ घर में आराम करना चाहिए था, वो उसे गोद में लेकर दफ्तर में काम कर रहीं थीं। वो देशभर में कामकाजी महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई हैं।

श्रीजना गुम्मला इस समय कोविड पॉजिटिव हैं और अपने घर से ही काम कर रही हैं। गुम्मला के परिवार में उनके एक साल के बेटे समेत सभी लोग पॉजिटिव है। गुम्मला कहती हैं, ‘हम जब भी बाहर निकलते हैं, वायरस के संभावित कैरियर हो सकते हैं। घर लौटते समय दिमाग में यही रहता कि हम वायरस लेकर तो नहीं आ रहे हैं।’

श्रीजना गुम्मला ग्रेटर वाइजैग की म्यूनिसिपल कमिश्नर हैं। फिलहाल वे कोविड पॉजिटिव हैं। वे कहती हैं कि मां के तौर पर बेटे से अलग रहना भावनात्मक तौर पर बहुत मुश्किल होता है।

श्रीजना गुम्मला ग्रेटर वाइजैग की म्यूनिसिपल कमिश्नर हैं। फिलहाल वे कोविड पॉजिटिव हैं। वे कहती हैं कि मां के तौर पर बेटे से अलग रहना भावनात्मक तौर पर बहुत मुश्किल होता है।

गुम्मला का बेटा तो जल्दी ही ठीक हो गया है, लेकिन वो अभी भी रिकवर कर रही हैं। संक्रमण के दौरान भी वो लगातार घर से काम करती रही हैं। वो कहती हैं, ‘मैं घर पर भी फाइलें देख रही हूं। ऐसे में काम पर लौटने जैसी बात तो नहीं है, हां ठीक होकर दफ्तर जाना शुरू करूंगी।’

गुम्मला कहती हैं कि सच तो है कि सभी मदर्स काम करती हैं, कुछ दफ्तर जाती हैं और कुछ पूरा दिन घरों में काम करती हैं। वो कहती हैं, ‘आज हम सामाजिक विकास के उस दौर में आ गए हैं जहां सामाजिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए आर्थिक रूप से प्रासंगिक बने रहना भी जरूरी है।’

गुम्मला पूरा दिन काम करके जब घर लौटती हैं तो घर में दाखिल होने से पहले अपने आप को पूरी तरह सेनेटाइज करती हैं, हाथ धोतीं हैं, मास्क हटाती हैं। वो अपने बेटे को गोद में उठाने से पहले नहाती और कपड़े बदलतीं हैं। वो कहती हैं, ‘एक मां के तौर पर घर लौटते ही सीधे बेटे को गोद में न उठा पाना भावनात्मक रूप से मुश्किल है, लेकिन महामारी के इन दिनों में ऐसा करना पड़ रहा है।’

श्रीजना गुम्मला कहती हैं कि कामकाजी महिला हो या घरेलू सभी अपने-अपने मोर्चे पर कुछ न कुछ संघर्ष कर रही हैं। मां होने के नाते महामारी से लड़ने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

श्रीजना गुम्मला कहती हैं कि कामकाजी महिला हो या घरेलू सभी अपने-अपने मोर्चे पर कुछ न कुछ संघर्ष कर रही हैं। मां होने के नाते महामारी से लड़ने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

सुशीला कटारिया, डॉक्टर, मेदांता, गुरुग्राम
गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में कोविड वार्ड की जिम्मेदारी संभालने वाली डॉ. सुशीला कटारिया के लिए बीता साल बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। इस दौरान वो भी अपने बच्चों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाई हैं।
सुशीला कहती हैं, ‘जब मैं सुबह अस्पताल के लिए जल्दी निकलती हूं तो पहले अपने 17 साल के बेटे के कमरे में झांकती हूं। वो गहरी नींद में होता है, मैं उसे जगाने की कोशिश करते हुए पूछती हूं कि क्या उसकी ऑनलाइन क्लास है, लेकिन नींद में वो हमेशा की तरह ही कन्फ्यूज्ड और खोया हुआ लगता है। एक मां के तौर पर मैं चिंतित रहती हूं कि जब वो स्कूल के बाद कॉलेज जाएगा और उसे सब कुछ अपने आप करना होगा तो वो कैसे चीजों को संभालेगा।’

गुरुग्राम के मेदांता में डॉक्टर सुशीला कटारिया कहती हैं कि पिछले एक साल से ज्यादा हो गया है, मुझे यह तक नहीं पता कि मेरे बच्चे स्कूल के असाइनमेंट सबमिट कर रहे हैं या नहीं। एक मां के तौर पर मैं उनका ख्याल नहीं रख पा रही हूं।

गुरुग्राम के मेदांता में डॉक्टर सुशीला कटारिया कहती हैं कि पिछले एक साल से ज्यादा हो गया है, मुझे यह तक नहीं पता कि मेरे बच्चे स्कूल के असाइनमेंट सबमिट कर रहे हैं या नहीं। एक मां के तौर पर मैं उनका ख्याल नहीं रख पा रही हूं।

सुशीला कहती हैं, ‘एक डॉक्टर के तौर पर मैंने जाना है कि वो नींद टूटने की बीमारी से पीड़ित है। कई बार मैं ये सोचकर परेशान हो जाती हूं कि मैं एक मां के रूप में उसका अच्छे से ख्याल नहीं रख पा रही हूं। मेरे दो बच्चे हैं। उनके स्कूल में क्या चल रहा है, उन्होंने असाइनमेंट सबमिट किए हैं या नहीं, मुझे कुछ नहीं पता।’

महामारी के दौरान बीते पंद्रह महीनों में सुशीला कटारिया की जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। अब उनका अधिकतर समय अस्पताल में या लोगों को ऑनलाइन कंसल्टेशन देने में ही बीतता है। वो अपने बच्चों पर पूरी नजर नहीं रख पा रही हैं।

वो कहती हैं, ‘बीते पंद्रह महीनों में मैं अपने दो किशोर होते बच्चों का पूरी तरह ध्यान नहीं रख पाई हूं। इस दौरान वो बड़े हुए हैं और समझदार भी। लेकिन मैं जानती हूं कि हमारे बीच बातचीत कम हुई है और भगवान ही जानता है कि हालात कब ठीक होंगे। कई बार मुझे लगता है कि दुनिया में लोगों की जान बचाने के लिए तो मैं मौजूद हूं, लेकिन अपने बच्चों के लिए मैं मौजूद नहीं हूं।’

पति और बच्चों के साथ डॉ. सुशीला कटारिया। वे कहती हैं कि भगवान करें कि हालात जल्द ठीक हो जाएं और मैं अपने किशोर होते बच्चों का ध्यान रख सकूं।

पति और बच्चों के साथ डॉ. सुशीला कटारिया। वे कहती हैं कि भगवान करें कि हालात जल्द ठीक हो जाएं और मैं अपने किशोर होते बच्चों का ध्यान रख सकूं।

वो कहती हैं, ‘बीते साल मेरे बेटे ने दसवीं की परीक्षा दी और अच्छे नंबर हासिल किए। अगले साल वो कॉलेज में होगा। वो भी मेडिकल स्कूल में जाना चाहता है। मेरी बेटी ज्यादा खुलकर अपनी बात रखती है। वो एक बात को लेकर बिलकुल स्पष्ट है कि उसे कुछ भी बनना है, लेकिन डॉक्टर नहीं बनना है।’

उर्वशी, श्रीजना और सुशीला जैसी लाखों माएं हैं जो अपना सब कुछ दांव पर लगाकर फ्रंटलाइन पर काम कर रही हैं। मदर्स डे पर हम इनके जज्बे को सलाम करते हैं।

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Author: thenewhind

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